अमित शाह का कांग्रेस पर प्रहार: “देश के विभाजन के लिए कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति जिम्मेदार”

गृह मंत्री ने आरोप लगाया कि आजादी के समय कांग्रेस नेतृत्व ने जल्दबाजी में सत्ता हासिल करने के लिए देश के टुकड़े करना मंजूर कर लिया।

नई दिल्ली: संसद के मौजूदा सत्र के दौरान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ (#OperationSindoor) पर हुई चर्चा ने अचानक एक तीखे राजनीतिक मोड़ का रूप ले लिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चर्चा का जवाब देते हुए देश के विभाजन के लिए सीधे तौर पर कांग्रेस की तत्कालीन नीतियों को जिम्मेदार ठहराया।

‘विभाजन एक ऐतिहासिक भूल’: गृह मंत्री

सदन को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कड़े शब्दों में कहा कि 1947 का विभाजन भारत के इतिहास की एक ऐसी त्रासदी है जिसे टाला जा सकता था। उन्होंने दावा किया, “यदि कांग्रेस नेतृत्व ने उस समय विभाजन की शर्तों को स्वीकार करने की जल्दबाजी न दिखाई होती, तो आज पाकिस्तान का अस्तित्व ही नहीं होता। यह कांग्रेस की तुष्टिकरण और अदूरदर्शी राजनीति का परिणाम है कि आज देश को सीमा पार से लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।” 446633 amitshah अमित शाह का कांग्रेस पर प्रहार: "देश के विभाजन के लिए कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति जिम्मेदार"

आंतरिक सुरक्षा और ‘ऑपरेशन सिंदूर’

गृह मंत्री ने केवल इतिहास पर प्रहार नहीं किया, बल्कि वर्तमान सरकार की सुरक्षा रणनीति का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि ‘#ऑपरेशन सिंदूर’ का मुख्य उद्देश्य देश की आंतरिक सुरक्षा को अभेद्य बनाना है। शाह ने स्पष्ट किया:

  • जीरो टॉलरेंस: सरकार आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद के प्रति पूरी तरह सख्ती बरत रही है।

  • मजबूत नेतृत्व: उन्होंने कांग्रेस पर उस दौर में कमजोर इच्छाशक्ति का आरोप लगाया, जिसके कारण देश की एकता खतरे में पड़ी थी।

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कांग्रेस का पलटवार

गृह मंत्री के आरोपों के तुरंत बाद कांग्रेस ने इसे ‘इतिहास से छेड़छाड़’ करार दिया। पार्टी के प्रवक्ताओं ने संसद के बाहर कहा कि 1947 की परिस्थितियां अत्यंत जटिल थीं, जहाँ सांप्रदायिक हिंसा का तांडव हो रहा था। कांग्रेस ने पलटवार करते हुए कहा, “भाजपा के पास अपनी उपलब्धियां बताने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वे हर बार इतिहास के पन्नों को गलत तरीके से पेश कर लोगों का ध्यान भटकाते हैं।”

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संसद में हुई इस बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत के इतिहास और राष्ट्रवाद की परिभाषा को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच की खाई और गहरी होती जा रही है। जहां भाजपा इसे ‘वैचारिक शुद्धिकरण’ मानती है, वहीं विपक्ष इसे ‘राजनीतिक प्रोपेगेंडा’ करार दे रहा है।


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